घाव Poetry (page 24)
न हो आरज़ू कुछ यही आरज़ू है
ग़ुलाम मौला क़लक़
मातम-ए-दीद है दीदार का ख़्वाहाँ होना
ग़ुलाम मौला क़लक़
ये तमन्ना नहीं कि मर जाएँ
ग़ज़नफ़र
ख़ून-ए-दिल मुझ से तिरा रंग-ए-हिना माँगे है
ग़यास अंजुम
नज़र लगे न कहीं उन के दस्त-ओ-बाज़ू को
ग़ालिब
नज़र लगे न कहीं इन के दस्त-ओ-बाज़ू को
ग़ालिब
जिस ज़ख़्म की हो सकती हो तदबीर रफ़ू की
ग़ालिब
ज़ख़्म पर छिड़कें कहाँ तिफ़्लान-ए-बे-परवा नमक
ग़ालिब
ये हम जो हिज्र में दीवार-ओ-दर को देखते हैं
ग़ालिब
सियाही जैसे गिर जाए दम-ए-तहरीर काग़ज़ पर
ग़ालिब
सरापा रेहन-इश्क़-ओ-ना-गुज़ीर-उल्फ़त-हस्ती
ग़ालिब
सफ़ा-ए-हैरत-ए-आईना है सामान-ए-ज़ंग आख़िर
ग़ालिब
सद जल्वा रू-ब-रू है जो मिज़्गाँ उठाइए
ग़ालिब
फिर कुछ इक दिल को बे-क़रारी है
ग़ालिब
नक़्श-ए-नाज़-ए-बुत-ए-तन्नाज़ ब-आग़ोश-ए-रक़ीब
ग़ालिब
नहीं है ज़ख़्म कोई बख़िये के दर-ख़ुर मिरे तन में
ग़ालिब
नफ़स न अंजुमन-ए-आरज़ू से बाहर खींच
ग़ालिब
न होगा यक-बयाबाँ माँदगी से ज़ौक़ कम मेरा
ग़ालिब
मस्ती ब-ज़ौक़-ए-ग़फ़लत-ए-साक़ी हलाक है
ग़ालिब
माना-ए-दश्त-नवर्दी कोई तदबीर नहीं
ग़ालिब
ख़मोशियों में तमाशा अदा निकलती है
ग़ालिब
कहूँ जो हाल तो कहते हो मुद्दआ' कहिए
ग़ालिब
कहते हो न देंगे हम दिल अगर पड़ा पाया
ग़ालिब
जिस ज़ख़्म की हो सकती हो तदबीर रफ़ू की
ग़ालिब
जब तक दहान-ए-ज़ख़्म न पैदा करे कोई
ग़ालिब
जब ब-तक़रीब-ए-सफ़र यार ने महमिल बाँधा
ग़ालिब
हुजूम-ए-ग़म से याँ तक सर-निगूनी मुझ को हासिल है
ग़ालिब
ग़ाफ़िल ब-वहम-ए-नाज़ ख़ुद-आरा है वर्ना याँ
ग़ालिब
एक एक क़तरे का मुझे देना पड़ा हिसाब
ग़ालिब
दिल से तिरी निगाह जिगर तक उतर गई
ग़ालिब
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