साथ Poetry (page 20)
सर्दी भी ख़त्म हो गई बरसात भी गई
शुजा ख़ावर
इसी पर ख़ुश हैं कि इक दूसरे के साथ रहते हैं
शुजा ख़ावर
उस बेवफ़ा का शहर है और वक़्त-ए-शाम है
शुजा ख़ावर
सर्दी भी ख़त्म हो गई बरसात भी गई
शुजा ख़ावर
समझते क्या हैं इन दो चार रंगों को उधर वाले
शुजा ख़ावर
जो क़िस्सा था ख़ुद से छुपाया हुआ
शुजा ख़ावर
बिछड़ गए थे किसी रोज़ खेल खेल में हम
शोज़ेब काशिर
सुरमई रातों से छिनवा कर सहर की रौनक़ें
शोरिश काश्मीरी
अब जी रहा हूँ गर्दिश-ए-दौराँ के साथ साथ
शोरिश काश्मीरी
ज़ख़्म-ए-दिल अब फूल बन कर खिल गया
शोला हस्पानवी
वो और होंगे जो वहम-ओ-गुमाँ के साथ चले
शोला हस्पानवी
अपना ख़ालिक़ ख़ुद ही था मेरा ख़ुदा कोई न था
शोला हस्पानवी
हम-सफ़र हो तो कोई अपना-सा
शोहरत बुख़ारी
वो पास आए आस बने और पलट गए
शोहरत बुख़ारी
वो पास आए आस बने और पलट गए
शोहरत बुख़ारी
कोठे उजाड़ खिड़कियाँ चुप रास्ते उदास
शोहरत बुख़ारी
बुत बने राह तकोगे कब तक
शोहरत बुख़ारी
ख़्वाब थे मेरे कुछ सुहाने से
शोभा कुक्कल
ज़िंदा रहे तो हम को न पहचान दी गई
शमशाद शाद
हमारे पाँव डरते हैं तुम्हारे साथ चलने में
शिवकुमार बिलग्रामी
साक़ी-ए-दौराँ कहाँ वो तेरे मय-ख़ाने गए
शिव चरन दास गोयल ज़ब्त
जिस तरफ़ हाल-ए-जुनूँ में तेरे दीवाने गए
शिव चरन दास गोयल ज़ब्त
तीर-ए-क़ातिल का ये एहसाँ रह गया
शिबली नोमानी
कुछ अकेली नहीं मेरी क़िस्मत
शिबली नोमानी
मिरी आह बे-असर है मैं असर कहाँ से लाऊँ
शेवन बिजनौरी
सोज़-ए-अलम से दूर हुआ जा रहा हूँ मैं
शेरी भोपाली
क़ुल्ज़ुम-ए-उल्फ़त में वो तूफ़ान का आलम हुआ
शेर सिंह नाज़ देहलवी
उस को अपनी ज़ात ख़ुदा की ज़ात लगी है
शेर अफ़ज़ल जाफ़री
नुत्क़ पलकों पे शरर हो तो ग़ज़ल होती है
शेर अफ़ज़ल जाफ़री
दुनिया ने किस का राह-ए-फ़ना में दिया है साथ
ज़ौक़
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