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कहाँ पे लाई है मेरी ख़ुदी कहाँ से मुझे - रिफ़अतुल क़ासमी कविता - Darsaal

कहाँ पे लाई है मेरी ख़ुदी कहाँ से मुझे

कहाँ पे लाई है मेरी ख़ुदी कहाँ से मुझे

न अपने दिल से ग़रज़ है न अपनी जाँ से मुझे

न इस जहान से निस्बत न उस जहाँ से मुझे

बस एक रब्त है दुनिया-ए-बे-निशाँ से मुझे

शुऊ'र-ए-ज़ीस्त मिला फ़िक्र-ए-दो-जहाँ से मुझे

मता-ए-दर्द मिली दिल के आस्ताँ से मुझे

क़रार-ए-जाँ न बनी अपनी हस्ती-ए-मौहूम

गिला यही है तिरी उम्र-ए-जावेदाँ से मुझे

ये हो रहे हैं सर-ए-अर्श तज़्किरे किस के

ये किस ने आज बुलाया है जिस्म-ओ-जाँ से मुझे

ज़रा सँभलने तो दे ऐ जहान-ए-कम-आसार

ख़ुद-आगही ने गिराया है आसमाँ से मुझे

पयम्बरी के एवज़ मैं ने शाइ'री की है

ये हौसला तो मिला उस के आस्ताँ से मुझे

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In Hindi By Famous Poet Rifat-ul-Qasmi. is written by Rifat-ul-Qasmi. Complete Poem in Hindi by Rifat-ul-Qasmi. Download free  Poem for Youth in PDF.  is a Poem on Inspiration for young students. Share  with your friends on Twitter, Whatsapp and Facebook.