ब-शक्ल-ए-नाख़ुन-ए-अंगुश्त सर कटाने से
हयात मिलती है जब इंतिक़ाल होता है
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साफ़ क्या हो सोहबत-ए-ज़ाहिर से बातिन का ग़ुबार
दिखा ऐ नाख़ुन-ए-ग़म लुत्फ़-ए-बाहम ऐसे सामाँ पर
देखो निगाह-ए-शौक़ से मेरी तरफ़ मुझे
वो हवा-ख़्वाह-ए-नसीम-ए-ज़ुल्फ़ हूँ मैं तीरा-बख़्त
मिसरे पे उन के मिस्रा-ए-क़द का गुमाँ हुआ
उस बुत को दिल दिखा के कलेजा दिखा दिया
रोता हूँ मैं तसव्वुर-ए-ज़ुल्फ़-ए-सियाह में
अदब बख़्शा है ऐसा रब्त-ए-अल्फ़ाज़-ए-मुनासिब ने
मज़मून-ए-इश्क़ ज़ेहन-ए-सितमगर में आ गया
न शरमाओ आँखें मिला कर तो देखो
मिरी जानिब को करवट ले के गर मुझ से लिपट जाओ