मैं तेरे क़रीब आते आते
कुछ और भी दूर हो गया हूँ
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न शाम है न सवेरा अजब दयार में हूँ
जी न सकूँ मैं जिस के बग़ैर
वो इश्क़ जो हम से रूठ गया अब उस का हाल बताएँ क्या
सोचते और जागते साँसों का इक दरिया हूँ मैं
बहुत छोटे हैं मुझ से मेरे दुश्मन
ये धूप तो हर रुख़ से परेशाँ करेगी
इक आग ग़म-ए-तन्हाई की जो सारे बदन में फैल गई
तू मिला था और मेरे हाल पर रोया भी था
फ़र्ज़ानों की इस बस्ती में एक अजब सौदाई है
ऐ मुझ को फ़रेब देने वाले
वो दौर क़रीब आ रहा है
इक शक्ल हमें फिर भाई है इक सूरत दिल में समाई है